मनुष्य की आत्मा केवल देह की क्षुद्र सीमाओं में बंधी नहीं होती वह अपने पूर्वजों से अदृश्य सूत्रों द्वारा जुड़ी रहती
दिनेश चंद्र मिश्र, गोरखपुर। श्रद्धा से जो अर्पित किया जाए वही श्राद्ध है। भारतीय संस्कृति के विराट आकाशमंडल में श्राद्ध वह ज्योतिर्मय दीप है जो अतीत और वर्तमान को जोड़ता है, पितरों और वंशजों के बीच एक आध्यात्मिक सेतु का कार्य करता है।
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अक्षय ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषी और अक्षय पंचांग के संपादक पंडित रवि शंकर पांडेय ने शनिवार को बातचीत में बताया कि मनुष्य की आत्मा केवल देह की क्षुद्र सीमाओं में बंधी नहीं होती वह अपने पूर्वजों से अदृश्य सूत्रों द्वारा जुड़ी रहती है। यही कारण है कि पितरों का स्मरण, उनका आशीर्वाद और उनके प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन भारतीय परंपरा में सर्वोच्च स्थान रखता है। श्राद्ध इसी भावना का मूर्त रूप है जो युगों से हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बना हुआ है।
ज्योतिषी पान्डेय ने बताया कि पितरों का तर्पण और श्राद्ध पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अति महत्वपूर्ण अनुष्ठान हैए ऐसा करके पितरों की आत्मा को तृप्त करना उन्हें मोक्ष दिलाना और परिवार में समृद्धि, स्वास्थ्य, यश, सुख और कुल में वृद्धि का साधन माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यह कार्य पितरों का तर्पण पिंड दान व श्राद्ध किया जाता है और इसके लिए पद्मपुराण में भी उल्लेख मिलता है, वैदिक ग्रंथों में श्राद्ध को पूर्वजों का आभार व्यक्त करने और परिवार के कल्याण का एक महत्वपूर्ण साधन बताया गया है।
उन्होंने बताया कि वेदों में यद्यपि .श्राद्ध. शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं तथापि .पितृयज्ञ. की संज्ञा से इसका स्वरूप मिलता है। ऋग्वेद के दशम मंडल में वर्णित पितृसूक्त मानवता की उस अनादि चेतना का उद्घोष है जिसमें पितरों का आह्वान कर उनसे आयु, बल और तेज प्राप्त करने की कामना की जाती है। उन्होंने कहा कि वैदिक ऋचाओं में कहा गया ..आयुर्ददतु पितरः, बलं ददतु पितरः, तेजो ददतु पितरः, स्वधा नमोऽस्तु वह यहाँ स्वधा का अर्थ ही है पितरों के लिए आहुतियाँ और अर्पण। वेदों की इस ऋचामाला से स्पष्ट होता है कि पितृदेवों का पूजन अनादि काल से मानव धर्म का अनिवार्य अंग रहा है। धीरे.धीरे जब यह परंपरा संगठित हुई तो इसे .श्राद्ध. कहा जाने लगा।
श्री पान्डेय ने बताया कि महाकाव्यों में भी इस परंपरा का अमूल्य साक्ष्य मिलता है। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में ही यह प्रसंग आता है कि श्रीराम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया। यह केवल कर्मकांड न था बल्कि पुत्र धर्म का परिपूर्ण निर्वाह था। महाभारत के अनुशासन पर्व में अत्रि मुनि ने श्राद्ध की महत्ता का प्रतिपादन किया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में श्राद्ध के उद्गम की कथा आती है कि यह प्रथा भगवान विष्णु के वराह अवतार से प्रारंभ हुई। तीन पिण्डों में क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह की उपस्थिति का दार्शनिक संकेत मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि श्राद्ध केवल व्यक्तिगत नहींए बल्कि वंशपरंपरा के तीन स्तरीय ऋण का स्मरण है।
उन्होंने बताया कि पुराणों में यह भी कथा आती है कि ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो अंशों से स्वयंभुव मनु और शतरूपा की सृष्टि की। इन्हीं से मानव समाज का विस्तार हुआ। मृत्युपरांत उन्हीं संतानों की स्मृति और उनके प्रति ऋणमुक्ति के लिए श्राद्ध परंपरा का सूत्रपात हुआ। यह केवल पितरों के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि यह मान्यता भी है कि जब तक पितृऋण से मुक्ति नहीं होतीए तब तक मानव जीवन की यात्रा अधूरी रहती है।
ज्योतिषाचार्य पान्डेय नेे बताया कि पितृपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक का पखवाड़ा श्राद्ध का विशेष काल है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि जब सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर प्रवेश करता हैए तब वह क्षण पितरों का दिन माना जाता है। आकाश का दक्षिण भाग पितरों के लिए समर्पित है। इस काल में आत्माएँ पितृलोक से उतरकर अपने वंशजों के समीप निवास करती हैं। इसीलिए पितृपक्ष में तर्पणए पिण्डदान और श्राद्ध का विधान है। पद्मपुराण में भी कहा गया है कि पितरों के प्रति अर्पित तर्पण उन्हें तृप्त करता हैए और तृप्त पितर अपने वंशजों को धनए धान्यए आरोग्य और समृद्धि प्रदान करते हैं।
उन्होंने बताया कि महाभारतकालीन दानवीर कर्ण की कथा श्राद्ध परंपरा का दार्शनिक आधार स्पष्ट करती है। कर्ण ने जीवन भर सोने का दान कियाए परन्तु कभी पितरों को अन्न का दान नहीं किया। जब वे स्वर्ग पहुँचे तो उन्हें घोर भूख सताने लगी और उनके स्पर्श से अन्न स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता तब इन्द्र ने उन्हें पन्द्रह दिन के लिए पृथ्वी पर लौटने का अवसर दिया ताकि वे पितरों का श्राद्ध कर सकें। यही अवधि आज पितृपक्ष के रूप में प्रतिष्ठित है। यह कथा केवल लोकश्रुति नहींए बल्कि यह दार्शनिक संदेश है कि धन का दान पर्याप्त नहींए पितरों के प्रति कृतज्ञता का अर्पण ही जीवन का सच्चा धर्म है।
शास्त्रों में श्राद्ध को केवल पितरों की आत्मा की तृप्ति का साधन नहीं माना गयाए बल्कि इसे कुल के कल्याण और भविष्य की समृद्धि का मार्ग बताया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है ..पितृदायं हि मनुष्याणां धर्माधर्मौ प्रबोधयेत्। अर्थात पितृऋण ही मनुष्यों को धर्म और अधर्म का बोध कराता है। जब वंशज पितरों का श्राद्ध करते हैं तो वे केवल उनका आभार व्यक्त नहीं करतेए बल्कि अपनी आत्मा को भी धर्म के पथ पर स्थिर करते हैं।
लोकजीवन में श्राद्ध की परंपरा ने अनेक रूप धारण किए। गाँवों में श्राद्ध के अवसर पर विशेष पकवान बनते हैंए कौवों और गौओं को भोजन कराया जाता हैए क्योंकि उन्हें पितरों का प्रतीक माना जाता है। कहीं.कहीं पितृगीत गाए जाते हैं और पितरों का स्मरण कर आँसू बहाए जाते हैं। यह सब उस लोकभावना का द्योतक है जिसमें पूर्वज केवल अतीत की स्मृति नहींए बल्कि वर्तमान जीवन के मार्गदर्शक होते हैं।
आधुनिक युग में जब जीवन पश्चिमी धारा से प्रभावित हो रहा हैए तब भी श्राद्ध की परंपरा भारतीय समाज में जीवित है। इसका कारण है कि यह परंपरा केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहींए बल्कि यह आत्मा की गहराई में अंकित कृतज्ञता का संस्कार है। आज भी जब कोई पुत्र या पौत्र अपने पितरों का श्राद्ध करता हैए तो वह केवल उनकी आत्मा को मोक्ष ही नहीं देता बल्कि स्वयं भी यह अनुभव करता है कि जीवन केवल व्यक्तिगत नहींए बल्कि सामूहिक और वंशानुगत भी है।
श्री पान्डेय ने आगे बताया कि श्राद्ध का दार्शनिक निष्कर्ष यह है कि यह हमें स्मरण कराता है ..मातृदेवो भवए पितृदेवो भवए आचार्यदेवो भव। माता पिता और आचार्य देवतुल्य हैं। श्राद्ध इन्हीं देवतुल्य पितरों की स्मृति को अक्षय बनाने का उपाय है। जब हम उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं तो वास्तव में हम अपने जीवन कोए अपने वंश को और अपने धर्म को सुरक्षित करते हैं। इसलिए श्राद्ध केवल मृतक.स्मरण नहींए यह आत्मा और ब्रह्मांड के बीच का आध्यात्मिक संवाद है। यह वह क्षण है जब वर्तमान अतीत को प्रणाम करता है और भविष्य को कृतज्ञता की ज्योति से आलोकित करता है। श्राद्ध में अर्पित अन्न केवल धान्य नहीं बल्कि वह श्रद्धा का पिण्ड है। उसमें समर्पित जल केवल जल नहीं बल्कि वह स्वधा है जो पितरों तक पहुँचकर उन्हें तृप्त करता है। श्राद्ध मानवता का वह दिव्य उत्सव है जहाँ श्रद्धा पिण्ड बनकर पितरों को अर्पित होती है और आशीर्वाद स्वधा बनकर वंशजों के जीवन को धनए धान्य और दिव्यता से पूरित करता है।
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