दुर्गा प्रसाद गुप्त,महराजगंज। भारतीय लोक संस्कृति के विशाल आकाश में छठ महापर्व आस्था का वह सूर्य है जो करोड़ों हृदयों को श्रद्धा, प्रकृति-प्रेम और अनुशासन की रोशनी से जगमगा देता है। सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित यह पर्व चार दिनों तक मन, वचन और कर्म की पवित्रता के साथ मनाया जाता है। गाँवों से लेकर महानगरों तक इसकी भव्यता, सादगी और आध्यात्मिक ऊँचाई एक जैसे स्वर में दिखाई पड़ती है।
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छठ की शुरुआत और स्वरूप
इस महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जहाँ व्रती अपने संकल्प के साथ शुद्धता का पालन शुरू कर देता है। दूसरे दिन खरना में बिना नमक और प्याज-लहसुन वाले प्रसाद से शुद्ध आहार ग्रहण किया जाता है। तीसरा दिन सांझ का अर्घ्य और चौथा दिन उषा अर्घ्य का होता है, जहाँ डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना संकेत है कि जीवन में ढलता समय भी पूजनीय है। उदीयमान सूर्य को जल चढ़ाकर नई शुरुआत, नई उम्मीदों का स्वागत किया जाता है। यही संतुलन छठ की आत्मा है।
छठ पर्व की कथा
लोकमान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या वापस लौटे, तब माता सीता ने सूर्य उपासना कर उनके स्वास्थ्य, जीवन और राज्य के कल्याण की प्रार्थना की। मान्यता है कि उन्होंने ही छठ व्रत की परंपरा शुरू की थी।
सूर्य देव की बहन छठी मैया को ऊर्जा, संतान और स्वास्थ्य की अधिष्ठात्री देवी के रूप में माना जाता है। कहा जाता है कि जो भी इस व्रत को पूर्ण निष्ठा और शुद्ध भावना से करता है, उसकी संतानों पर संकट कम पड़ते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
एक अन्य कथा महाभारत काल से जुड़ी है।
कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे और महान दानी योद्धा भी। वे प्रतिदिन सूर्योदय से पहले नदी में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। माना जाता है कि कर्ण ने ही सूर्य पूजा की इस परंपरा को जन-जन तक पहुँचाया, जो बाद में छठ के स्वरूप में प्रचलित हुई।
छठ पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व :छठ पर्व सामूहिकता का अनोखा उत्सव है जहाँ सभी जाति-वर्ग एक समान होकर पूजा करते हैं। इसमें बिना मूर्ति पूजा के, सीधे प्रकृति की उपासना होती है जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है।अनुशासन, संयम और आत्मशुद्धि इस पर्व का मूल आधार है।लोकगीत, ताल और समवेत स्वर हमारे लोकसंगीत को जीवित रखते हैं।
श्रद्धा का ऐसा संगम…
सूरज की किरणें जब गंगा, सरयू या किसी भी नदी-तालाब की लहरों पर चमकती हैं, तब व्रतियों की मुडे हथेलियाँ आकाश की ओर उठकर प्रार्थना करती हैं:
“छठी मैया, हमारे घर-आँगन को सदा सुरक्षित और खुशहाल रखना।”
व्रतियों की तपस्या, मन्नतों की डोर, संतानों का भविष्य और परिवार का कल्याण…अपने भीतर समेटे यह पर्व हर वर्ष नई आस्था का सूर्योदय कराता है।छठ महापर्व केवल परंपरा नहीं…जीवन को नए प्रकाश से भर देने वाली आध्यात्मिक अनुभूति है।
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