उदय सिंह लोधी, बटियागढ़ / छिंदवाड़ा। किसान रूपेंद्र सिंह ठाकुर के साथ डॉ. द्वारका द्वारा निरीक्षण करने पर पाला के प्रति संवेदनशीलता टमाटर, मिर्च जैसी सब्जियों में अधिक दिखने को मिल रही है। वर्तमान समय में पाला अथवा तुषार शीत ऋतु में होने वाली एक प्राकृतिक आपदा है, जो विशेषकर रबी मौसम की फसलों, सब्जियों, फलदार पौधों एवं नर्सरी के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होती है।
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जब वायुमंडल का तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे चला जाता है और हवा में उपस्थित जलवाष्प सीधे बर्फ के महीन कणों के रूप में पौधों की सतह पर जम जाती है, तब उसे पाला या तुषार कहा जाता है। यह स्थिति प्रायः साफ आसमान, शांत वातावरण, कम आर्द्रता और लंबी रातों के दौरान बनती है। पाले की मार से पौधों की कोशिकाओं में जमी बर्फ उनके ऊतकों को नष्ट कर देती है, जिससे फसल की वृद्धि रुक जाती है और कई बार पूरी फसल नष्ट होने की कगार पर पहुंच जाती है।
पाला पड़ने के प्रमुख कारणों में तेज ठंड, शीतलहर, बादलों का न होना, रात में तेज विकिरण द्वारा ताप का नुकसान तथा हवा का शांत रहना शामिल है। निम्न भूमि वाले क्षेत्रों में ठंडी हवा जमा हो जाने के कारण पाले की संभावना अधिक रहती है। हल्की मिट्टी, कम नमी और खुला खेत भी पाले को बढ़ावा देते हैं। विशेष रूप से दिसंबर से फरवरी के बीच उत्तर भारत में पाले का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है, जिससे गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू, टमाटर, मिर्च, बैंगन जैसी फसलें प्रभावित होती हैं।
पाले के लक्षण प्रातःकाल स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। पौधों की पत्तियां झुलसी हुई, मुरझाई या काली पड़ जाती हैं। कोमल शाखाएं और फूल सूखने लगते हैं, फल गिरने लगते हैं तथा पौधों की बढ़वार रुक जाती है। कई बार पत्तियों पर सफेद परत या जलने जैसे धब्बे दिखाई देते हैं। गंभीर स्थिति में पूरा पौधा सूखकर नष्ट हो सकता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है।
डॉ. द्वारका (कीटशास्त्र विभाग, कृषि महाविद्यालय, पन्ना) के अनुसार पाले से बचाव के लिए समय रहते सावधानियां अपनाना अत्यंत आवश्यक है। खेत में उचित सिंचाई करने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है और पाले का प्रभाव कम होता है। हल्की सिंचाई पाला पड़ने की संभावना वाली रात से पहले करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। खेत की मेड़ पर धुआं करने की व्यवस्था, जैसे पराली, सूखी घास या पुआल या गोबर के उपले जलाकर धुआं फैलाना, तापमान को कुछ हद तक बढ़ाने में सहायक होता है। नर्सरी और सब्जी फसलों को पॉलीथीन शीट, घास-फूस या टनल तकनीक से ढककर भी पाले से बचाया जा सकता है। रासायनिक प्रबंधन की दृष्टि से भी पाले के प्रभाव को कम किया जा सकता है। पाला पड़ने की आशंका होने पर फसलों पर 0.1 प्रतिशत सल्फ्यूरिक एसिड या 0.5 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट का छिड़काव लाभकारी पाया गया है।
इसके अतिरिक्त एक मिलीलीटर सल्फ्यूरिक एसिड प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से पौधों की कोशिकाओं में ठंड सहन करने की क्षमता बढ़ती है। कुछ स्थानों पर थायोयूरिया (0.1 प्रतिशत) या जिब्रेलिक एसिड की अनुशंसित मात्रा का छिड़काव भी फसलों को पाले से उबरने में मदद करता है। रासायनिक छिड़काव हमेशा विशेषज्ञों की सलाह से और उचित मात्रा में ही करना चाहिए। किसानों के लिए यह आवश्यक है कि मौसम पूर्वानुमान पर विशेष ध्यान दें और पाले की चेतावनी मिलते ही खेत में बचाव के उपाय शुरू कर दें। अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग से बचें, क्योंकि इससे पौधे कोमल हो जाते हैं और पाले का असर अधिक होता है।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई और डॉ. द्वारका के अनुसार रासायनिक उपाय अपनाकर पाले से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस प्रकार पाला या तुषार भले ही एक प्राकृतिक आपदा हो, लेकिन सही जानकारी, सतर्कता और समय पर किए गए प्रबंधन उपायों से किसान अपनी फसलों की रक्षा कर सकते हैं और आर्थिक क्षति से बच सकते हैं।
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